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Category Archives: गजल

કર્મ ને આધીન

સાંભળ્યું છે, કર્મ ને હું આધીન છું,
પણ હું મારી જડતાને પરાધીન છું.

જે સાંભળ્યું છે, ક્યારેય ગમ્યું નથી,
મારા સંકલ્પો માં, નિત્ય પ્રાચીન છું.

બદલાતાં વાયરે બદલાવુ ગમ્યું નથી,
હૃદય ની સાખે વ્હેતો, હું સ્વાધીન છું.

ગાગાગાગા ગાગાગાલ ગાગાલગા

જનક મ દેસાઈ

 

कौन से सोने मैं !!

दूरसे देख रहा हूं मैं, तू है खुश तेरे कोने में
रहेना वहीं, भूलेसे ना देखना  मेरे कोने में

कितना प्यार था मुज़े, ख्वाब भी बहोत थे
एहसास अब है, मेरे पाँव थे अँधेरे कोने में
कैसे बजाता मैं ताली और वो मधुर साज़
रेतसे सज़ा रहाथा मेरा घर  तेरे कोने में

दूर ही रहेना अब आदत हो गई  मुजे अब
मैं भी हू खुश, बहोत ही खुश मेरे कोने में

जनक देसाई

 
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Posted by on April 2, 2012 in गजल, જનક દેસાઈ

 

सादगी पर उसकी मर जाने की हसरत दिल में है

सादगी पर उसकी मर जाने की हसरत दिल में है
बस नहीं चलता, की फिर खंज़र कफ़े-कातिल में है

देखना तकरीर की लज्जत कि जो उसने कहा
मैंने यह जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में है

गरचे है किस-किस बुराई से, वले वा ई हमा
जिक्र मेरा मुझसे बेहतर है कि उस महफ़िल में है

बस, हुजूम – नौमीदी, खाक में मिल जाएगी
ये जो एक लज्जत हमारी सइ-ए-बेहासिल में है

रंजे -रह क्यों खिचिये खामान्दगी से इश्क है
उठ नहीं सकता हमारा जो कदम मंजिल में है

जल्वा-जारे-आतशे-दौजख हमारा दिल सही
फितना-ए-शोरे-कयामत किसके आबो-गिल में है

है दिले-शौरिदा-ए-ग़ालिब तिलिस्मे-पेचो-ताब
रहम कर अपनी तमन्ना पर कि किस मुश्किल में है……..~मिर्झा ग़ालिब

 

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