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आजाद हू में

16 Nov

मै पंछी हू उन्मुक्त गगन का, पिंजरे की पहचाण  नहीं

उड़ता फिरु मस्त गगन में, बुलंदी से कौई हार नहीं

तू चल मेरे साथ, तू है मेरी आश, हम गीत खुशी के गाये,

आजाद हू में , आजाद गगन, हम दूर नजर फैला ए

सपनों का सुलतान हू में, ना दिल में कोई मर्यादा,

जी चाहे न्योछावर कर दु , दु प्यार करने का वादा

सूरज की लाली से लेकर संध्या की निस्तब्ध धारा तक

चाँदणी रात के उजियारे में, थारे संग रहू में बेशक

ढलने दे अब शाम सुहाणी,  पलने दे अब अपणी कहाणी

सुबहा के रंगी किरणों से , खिलती रहेगी अपणी जवानी………..जनक देसाई

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Posted by on November 16, 2011 in જનક દેસાઈ

 

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