RSS

सप्नोकी दुनिया

18 Aug

जो गुज़र गया, उसे न याद कर

है जो गुम, एक पल ना बरबाद कर

जो है ना तेरी काबू में, काहे उनपे वार कर


बसा ले…..

एक दुनिया, सपनोकी…..


है न कभी वहां इंतजार

ना लूट सके कोई एक भी बार

०८-१७-2011

About these ads
 
4 Comments

Posted by on August 18, 2011 in જનક દેસાઈ

 

Tags:

4 responses to “सप्नोकी दुनिया

  1. Preeti

    August 18, 2011 at 1:35 am

    Nice poem

     
  2. પરાર્થે સમર્પણ

    August 18, 2011 at 2:27 am

    बहुत अच्छी कविता रची हे , धन्यवाद

     
    • Janak Manilal Desai

      August 18, 2011 at 2:33 am

      आभार आपका, यहाँ आकर पढ़ने के लिए, और आपके सोच व्यक्त करने के लिए.

      जनक

       
 
%d bloggers like this: