सप्नोकी दुनिया

जो गुज़र गया, उसे न याद कर

है जो गुम, एक पल ना बरबाद कर

जो है ना तेरी काबू में, काहे उनपे वार कर


बसा ले…..

एक दुनिया, सपनोकी…..


है न कभी वहां इंतजार

ना लूट सके कोई एक भी बार

०८-१७-2011

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4 Responses

    1. Thank you, again for reading and visiting.

  1. बहुत अच्छी कविता रची हे , धन्यवाद

    1. आभार आपका, यहाँ आकर पढ़ने के लिए, और आपके सोच व्यक्त करने के लिए.

      जनक

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