गम के बूँदों की झड़ी क्यों आई
जाने क्यों? ऐसी घड़ी क्यों आई
दिल मेरा टूट के वीरान हुआ जाता है
रात बेचैन बड़ी क्यों आई
खत्म होता ही नहीं सिलसिला जुदाई का
ऐसी मुद्दत ये बड़ी क्यों आई
ख़्वाबों ख्वाहिश थी जो थोड़ी दिल में
छूट जाने की घड़ी क्यों आई
वों भी हो जाये मेरी तरह से बरबाद जनक
जेहन में सोच बुरी क्यों आई
कौन इस फलसफे को समजेगा
सर पे ये धूप कड़ी क्यों आई
…….और फिर
रुख से पर्दा उठा तो भेद खुला
इन बहारों की घड़ी क्यों आई
कैसे बतलाऊँ में , समझाउ कैसे
उनपे मरने की घडी क्यों आई
गर न समझो तो, कभी समजाऊ
दिल पेन नगमों की झड़ी क्यों आई
उनकी झुलफो की इनायत है जनक
वस्ल की रात बड़ी क्यों आई
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ये दूसरा भाग एक उर्दू लेखक ने, पहले भाग के जवाब के रूप में लिखा.
साहब आये थे मेरी मदद करने, और एक महान कृपा करके चले गए. अब उनका पता भी नहीं.
एक बात जरूर, मेरा लिखा पहले भाग के सोच को बड़ी अच्छी तरह से समझ लिया उन्होंने!
वस्ल की रात – मिलन की रात
फलसफा – Ideals, philosophy, thoughts
इनायत – Favor, Maherbani
( २००८-२००९ )

कौन इस फलसफे को समजेगा
सर पे ये धूप कड़ी क्यों आई
દ્ક્ષેશ્ ભાઈ,
વાંચવા માટે આભાર.
પ્રશ્ન: તમે જે બે પંક્તિઓ મૂકી, એ ગમી, કે કંઇક બરાબર નથી!
સમય મળે જણાવશોજી.
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